शनिवार, 8 अगस्त 2009

अधुरा चित्र

नारी जो न्यारी है , ममता की मुरति है ,
बर्बर सी चीर को तन पे तन पे लपेटी है,
दीन हीन हाल में , राह में बिसेरी है ,
नैनन से नीर की निशीथ निर्झरित है ,
अश्क मोती कपोल पे करुणा बिखेरी है ,
भूख से बेहाल वो , चिंता में जड़ित है ,
भास्कर की रश्मि से, तीब्र तीब्र तपित है ,
शीश से कुछ श्वेद की चंद बूंद लुढ़की हैं ,
मांग की कुंकुम , उन बूंद साथ सरकी हैं,
लारियों को उड़ती धूल, तन मन को भठित हैं,
प्यास से बेहाल सी, गहन पीड़ा ग्रसित है ,


एक भिखारी उसी राह, कटोरा लिए जा रहा ,
रोटी के टुकड़े को देख देख जा रहा ,
मन में इक छोटी सी खुशी से फुला जा रहा,
संतोष की साँस लिए राह चलता जा रहा ,

नेह उसकी पड़ी तभी , तिलमिल सी नारी पर ,
सोचा संतोषी मै , थोडी सी मदद कर ,
पूछा - हे अनुजा तुम बैठी क्यों इस कदर ,
कौन सी विपत्ति है , टूट पड़ी आ तुम पर,

स्वर प्रस्फुटित के लिए होठ थोड़े खुल पड़े ,
चक्षु भी भिक्षु को अग्रज सा देख पड़े ,
होठ से दर्द भरे आह थोड़े निकल पड़े,
नैनों से चंद मोती , बरबस ही लुढ़क पड़े |

गोपी संवाद

फोड़ो न कन्हैया हे छलिया, रस से भरी मेरी गागर को ,
इह रस में तो प्रेम झलिकीहें-
जाको बाटें हम गावहिं गावन|
प्रेम मोल इह ले ले करिके -
चालत हमारो जीवन यापन|
एहि रस को पीकर सारा जग, पार करत भवसागर को,
फोड़ो कन्हैया हे छलिया, रस से भरी मेरी गागर को |
तोहरी चरण की रज् हैं हम सब ,
सकल जनम तेरहि गुण गावन |
पाकरि तुझको हम सब धन हैं ,
इहि गोपिन को तुहीं तारण |
हम गोपिन की बदलो हरी, 'प्यासा' इस जीवन घांघर को ,
फोड़ो कन्हैया हे छलिया, रस से भरी मेरी गागर को |