शनिवार, 8 अगस्त 2009

गोपी संवाद

फोड़ो न कन्हैया हे छलिया, रस से भरी मेरी गागर को ,
इह रस में तो प्रेम झलिकीहें-
जाको बाटें हम गावहिं गावन|
प्रेम मोल इह ले ले करिके -
चालत हमारो जीवन यापन|
एहि रस को पीकर सारा जग, पार करत भवसागर को,
फोड़ो कन्हैया हे छलिया, रस से भरी मेरी गागर को |
तोहरी चरण की रज् हैं हम सब ,
सकल जनम तेरहि गुण गावन |
पाकरि तुझको हम सब धन हैं ,
इहि गोपिन को तुहीं तारण |
हम गोपिन की बदलो हरी, 'प्यासा' इस जीवन घांघर को ,
फोड़ो कन्हैया हे छलिया, रस से भरी मेरी गागर को |

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